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बस कर, अब रुलाएगा क्या?



 
दिल्ली वालों, अब बस भी करो - इनसे ना हो पायेगा । 
और नहीं झेला जाता इस रोज-रोज की "आप-नौटंकी" को । 

श्री अरविन्द केजरीवाल जी और उनके राजनैतिक गठबंधन "आम आदमी पार्टी" से मुझे कोई शिकायत नहीं है । ये तो जनतंत्र का नियम है जिसके चलते इस देश का कोई भी नागरिक चुनाव के लिए खड़ा हो सकता है । उसे जितना या हराना केवल जनता जनार्दन (मतदाताओं) के हाथ में होता है । हमारी शिकायत है दिल्ली के मतदाताओं से । इसीलिए ये पोस्ट हम ख़ास दिल्ली वालों को सम्बोधित करते हुए, हिंदी में लिख रहे हैं । 

हमने आपको बहुत समझाने की कोशिश की थी । राष्ट्रीय अखबारों और टीवी में ना सही (वो तो कांग्रेस के हाथों बिके हुए थे) लेकिन इंटरनेट  के माध्यम से और विभिन्न प्रादेशिक हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में लम्बे-छोटे लेख लिखे थे । ब्लॉग पोस्ट, फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से हमने आपको ना केवल सामान्य जानकारी प्रदान करी, लेकिन इनकी (आम आदमी पार्टी) आतंरिक गतिविधियों, परिस्थिति और राजनीतिक परिपेक्ष से भी अवगत कराते हुए पूर्ण रूप से आपको सचेत भी किया था । हमने ये भी सोचा के दिल्ली के नागरिक अति-व्यस्तता के कारण लम्बे लेख ना पढ़ पाएँ, इसलिए इसी ब्लॉग पर, चुनाव के ठीक एक-दो दिन पहले, फ़ोटो के माध्यम से आपको इस 'आप' नामक नौटंकी के सारे रूप भी दिखाए थे । 

फोटो-ब्लॉग के माध्यम से हमने:
- आपको इनके ख़ास मित्रों से परिचित कराया । 
- इनके पुराने ड्रामेबाज़ होने के बारे में बताया ।
- इनके 'सेक्युलर' ढोंगीपन की बात की ।
- इनके पुराने ४९-दिनों के विफल शासन-काल और शासन-प्रणाली से अवगत कराया । 
-  इन आम आदमी के रंगों से परिचित कराया । 
- ये भी बताया कि ये मीडिया के लाडले हैं ।          



लेकिन आपको तो एक बार फिर से "सेक्युलर" सरकार की धुन सवार हो चुकी थी, जो आप लोग पिछले पैंसठ वर्ष से लगातार देख ही रहे हैं । और ये संकल्प आपने पहली बार नहीं लेकिन दूसरी बार, वो भी उनकी पिछली '४९-दिन' की विफलता देखने के पश्चात, पूरी सोच-समझ, होशो-हवास और चिंतन के बाद ही लिया । हमें इस बात पर बेहद आश्चर्य, आक्रोश और निराशा हुई है - दिल्ली के मतदाताओं से । आपको एक बार फिर वही गलती दोहराने की सज़ा तो मिलनी ही थी । आपने ये जो 'सेक्युलर सरकार' का विष-पान किया है, और जिस संख्या में इनको जिताया है, जहां आपने विपक्ष की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी, उसका हर्जाना तो आपको भुगतना ही पड़ेगा । 

यानी कि पूरे पांच साल तक इस "नौटंकी-सरकार" के शासन काल को भुगतना पड़ेगा और उसमे सड़ना पड़ेगा । 


हाँ, शुक्र है कि इस सब के चलते (यानि की दिल्ली सरकार के शासन काल के अंतर्गत) आप दिल्ली-वाले, 'केंद्रीय सरकार' के बहुत करीब हैं और ये आपके लिए एक बहुत बड़ी मदद साबित हो सकती है । 
या तो ऊपर वाला या फिर केंद्रीय सरकार, ये ही अब आपका कुछ भला कर सकते हैं ।

हम आपको एक बार फिर ये आश्वासन देना चाहेंगे कि आज भी, इस कठिन एवं बुरे समय में, हम आपके साथ हैं और हमारी पूरी सहानुभूति आपके साथ है । हम आपका दर्द समझते हैं और उम्मीद करते हैं कि इस देश के बाकी नागरिक और मतदाता आपसे और आपके गलत निर्णय से एक बहुत बड़ा राजनैतिक सबक लेंगे । दिल्ली वालों ने इस देश को ये राजनीतिक सबक और दिशा दिखाने में जो अहम भूमिका अदा की है, उसके लिए ये देश आपका हमेशा के लिए आभारी रहेगा ।      

हम इस मसले को और आगे ना बढ़ाते हुए यहीं समाप्त करते हैं । नहीं तो हमारे 'मित्र' बोलेंगे -
"बस कर , अब रुलाएगा क्या?"
 

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